रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय के पादप विज्ञान विभाग को पर्यावरण संरक्षण और मृदा सुधार की दशा में महत्वपूर्ण सफलता
बरेली,12 सितम्बर। रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय के पादप विज्ञान विभाग को पर्यावरण संरक्षण और मृदा सुधार की दिशा में एक बड़ी और महत्वपूर्ण सफलता हासिल हुई है। विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विजय कुमार सिन्हाल के कुशल दिशा-निर्देशन में किए गए एक आधुनिक शोध कार्य के लिए शोधार्थी अमिता को डॉक्टरेट (Ph.D.) की उपाधि से सम्मानित किया गया है।
अमिता द्वारा प्रस्तुत यह शोध पर्यावरण में तेजी से बढ़ रहे ‘हेवी मेटल’ (भारी धातु) प्रदूषण को प्राकृतिक और प्रभावी तरीके से समाप्त करने में एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है।
ग्रीन टेक्नोलॉजी और फाइटो-रिमेडिएशन का अनूठा मेल
इस शोध कार्य की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें नैनो पार्टिकल्स के निर्माण के लिए किसी हानिकारक रसायन के बजाय पूर्णतः प्राकृतिक ‘मोरिंगा’ (सहजन) की पत्तियों का उपयोग किया गया है। मोरिंगा की पत्तियों के अर्क से ‘जिंक ऑक्साइड नैनो पार्टिकल्स’ (Zinc Oxide Nanoparticles) तैयार किए गए।
इसके बाद इन नैनो पार्टिकल्स का उपयोग सूरजमुखी के पौधों की ‘फाइटो-रिमेडिएशन’ (पौधों द्वारा जहरीले तत्वों को सोखने की प्रक्रिया) क्षमता को जांचने और बढ़ाने के लिए किया गया।
शोध के मुख्य निष्कर्ष:
ढाई गुना बढ़ी कार्यक्षमता: मोरिंगा आधारित जिंक ऑक्साइड नैनो पार्टिकल्स के उपयोग से सूरजमुखी के पौधों की हेवी मेटल प्रदूषण को कम करने की क्षमता 2.5 गुना (ढाई गुना) तक बढ़ गई।
अधिक अवशोषण: नैनो पार्टिकल उपचारित सूरजमुखी के पौधों ने प्रदूषित मिट्टी से सामान्य पौधों की तुलना में ढाई गुना अधिक भारी धातुओं को सोखकर मिट्टी को शुद्ध किया।
पर्यावरण-अनुकूल तकनीक: मोरिंगा की पत्तियों का इस्तेमाल होने के कारण यह तकनीक पूरी तरह से हरित, सस्ती और पर्यावरण के अनुकूल है।
पर्यावरण संरक्षण में निभाएगा निर्णायक भूमिका
औद्योगीकरण और रासायनिक खादों के अत्यधिक प्रयोग के कारण कृषि योग्य मिट्टी में हेवी मेटल का प्रदूषण एक गंभीर वैश्विक समस्या बन चुका है। डॉ. विजय कुमार सिन्हाल के मार्गदर्शन में हुआ अमिता का यह शोध न केवल प्रदूषित जमीनों को पुनः उपजाऊ बनाने में मददगार साबित होगा, बल्कि कृषि व पर्यावरण विज्ञान के क्षेत्र में ग्रीन-नैनो-टेक्नोलॉजी के उपयोग का एक नया रास्ता भी खोलेगा। इस शोध कार्य के लिए मेरठ कृषि विश्वविद्यालय के परीक्षक प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, महात्मा ज्योतिबा फूले रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय की पूर्व प्रति कुलपति प्रोफेसर वी. पी. सिंह पादप विज्ञान विभाग के प्रोफेसर आलोक श्रीवास्तव, प्रोफेसर संजय गर्ग, प्रोफेसर जे. एन. मौर्य, प्रोफेसर उपेंद्र कुमार, प्रोफेसर पंकज कुमार अरोड़ा, तथा डॉक्टर ललित कुमार पांडे ने अमिता एवं डॉ विजय कुमार सिंहाल क़ो बधाई दी।पादप विज्ञान में बड़ी सफलता: मोरिंगा से बने जिंक ऑक्साइड नैनो पार्टिकल्स हेवी मेटल प्रदूषण से दिलाएंगे मुक्ति, सूरजमुखी पौधों की सफाई क्षमता 2.5 गुना बढ़ी
पादप विज्ञान विभाग में पर्यावरण संरक्षण और मृदा सुधार की दिशा में एक बड़ी और महत्वपूर्ण सफलता हासिल हुई है। विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विजय कुमार सिन्हाल के कुशल दिशा-निर्देशन में किए गए एक आधुनिक शोध कार्य के लिए शोधार्थी अमिता को डॉक्टरेट (Ph.D.) की उपाधि से सम्मानित किया गया है।
अमिता द्वारा प्रस्तुत यह शोध पर्यावरण में तेजी से बढ़ रहे ‘हेवी मेटल’ (भारी धातु) प्रदूषण को प्राकृतिक और प्रभावी तरीके से समाप्त करने में एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है।
ग्रीन टेक्नोलॉजी और फाइटो-रिमेडिएशन का अनूठा मेल
इस शोध कार्य की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें नैनो पार्टिकल्स के निर्माण के लिए किसी हानिकारक रसायन के बजाय पूर्णतः प्राकृतिक ‘मोरिंगा’ (सहजन) की पत्तियों का उपयोग किया गया है। मोरिंगा की पत्तियों के अर्क से ‘जिंक ऑक्साइड नैनो पार्टिकल्स’ (Zinc Oxide Nanoparticles) तैयार किए गए।
इसके बाद इन नैनो पार्टिकल्स का उपयोग सूरजमुखी के पौधों की ‘फाइटो-रिमेडिएशन’ (पौधों द्वारा जहरीले तत्वों को सोखने की प्रक्रिया) क्षमता को जांचने और बढ़ाने के लिए किया गया।
शोध के मुख्य निष्कर्ष:
ढाई गुना बढ़ी कार्यक्षमता: मोरिंगा आधारित जिंक ऑक्साइड नैनो पार्टिकल्स के उपयोग से सूरजमुखी के पौधों की हेवी मेटल प्रदूषण को कम करने की क्षमता 2.5 गुना (ढाई गुना) तक बढ़ गई।
अधिक अवशोषण: नैनो पार्टिकल उपचारित सूरजमुखी के पौधों ने प्रदूषित मिट्टी से सामान्य पौधों की तुलना में ढाई गुना अधिक भारी धातुओं को सोखकर मिट्टी को शुद्ध किया।
पर्यावरण-अनुकूल तकनीक: मोरिंगा की पत्तियों का इस्तेमाल होने के कारण यह तकनीक पूरी तरह से हरित, सस्ती और पर्यावरण के अनुकूल है।
पर्यावरण संरक्षण में निभाएगा निर्णायक भूमिका
औद्योगीकरण और रासायनिक खादों के अत्यधिक प्रयोग के कारण कृषि योग्य मिट्टी में हेवी मेटल का प्रदूषण एक गंभीर वैश्विक समस्या बन चुका है। डॉ. विजय कुमार सिन्हाल के मार्गदर्शन में हुआ अमिता का यह शोध न केवल प्रदूषित जमीनों को पुनः उपजाऊ बनाने में मददगार साबित होगा, बल्कि कृषि व पर्यावरण विज्ञान के क्षेत्र में ग्रीन-नैनो-टेक्नोलॉजी के उपयोग का एक नया रास्ता भी खोलेगा। इस शोध कार्य के लिए मेरठ कृषि विश्वविद्यालय के परीक्षक प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, महात्मा ज्योतिबा फूले रुहेलखण्ड
विश्वविद्यालय की पूर्व प्रति कुलपति प्रोफेसर वी. पी. सिंह पादप विज्ञान विभाग के प्रोफेसर आलोक श्रीवास्तव, प्रोफेसर संजय गर्ग, प्रोफेसर जे. एन. मौर्य, प्रोफेसर उपेंद्र कुमार, प्रोफेसर पंकज कुमार अरोड़ा, तथा डॉक्टर ललित कुमार पांडे ने अमिता एवं डॉ विजय कुमार सिंहाल क़ो बधाई दी। बरेली से अखिलेश चन्द्र सक्सेना की रिपोर्ट


---------------------------------------------------------------------------------------
----------------------------------------------------------------------------------------
---------------------------------------------------------------------------------------------
---------------------------------------------------------------------------------------------------

